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Paragraph on environmental pollution

भौतिक प्रदूषण जैसे स्थल प्रदूषण, जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण आदि, और 2. Odum) ने प्रदूषण (pollution) को निम्न शब्दों में परिभाषित किया हैं- “Pollution is an undesirable change in the physical, chemical or biological characteristics of air, water and land (i.e., environment) that will be, or may be, harmful to human & other life, industrial processes, living condition and cultural assets.” अर्थात- “प्रदूषण का तात्पर्य वायु, जल या भूमि (अर्थात पर्यावरण) की भौतिक, रसायन या जैविक गुणों में होने वाले ऐसे अनचाहे परिवर्तन हैं जो मनुष्य एवं अन्य जीवधारियों, उनकी जीवन परिस्थितियों, औद्योगिक प्रक्रियाओं एवं सांस्कृतिक धरोहरों के लिये हानिकारक हों।” Pollution शब्द के ग्रीक मूल का शाब्दिक अर्थ है defilement अर्थात दूषित करना, भ्रष्ट करना। प्रदूषणकारी वस्तु या तत्व को प्रदूषक (pollutant) कहते हैं। कोई भी उपयोगी तत्व गलत मात्रा में गलत स्थान पर होने से वह प्रदूषक हो सकता है। उदाहरणार्थ, जीवधारियों के लिये नाइट्रोजन एवं फास्फोरस आवश्यक तत्व है। इनके उर्वरक के रूप में उपयोग से फसल-उत्पादन तो बढ़ता है किन्तु जब ये अधिक मात्रा में किसी-न-किसी तरह से नदी या झील के जल में पहुँच जाते हैं तो अत्यधिक काई पैदा होने लगती है। आवश्यकता से अधिक शैवालों के पूरे जलाशय में एवं जल-सतह पर जमा होने से जल-प्रदूषण होने की स्थिति बन जाती है। प्रदूषक सदैव व्यर्थ पदार्थ के रूप में ही नहीं होते। कभी-कभी एक स्थिति को सुधारने वाले तत्व का उपयोग दूसरी स्थिति के लिये प्रदूषणकारी हो सकता है। प्रदूषक पदार्थ प्राकृतिक इकोतंत्र से तथा मनुष्य द्वारा की जाने वाली कृषि एवं औद्योगिक गतिविधियों के कारण उत्पन्न होते हैं। प्रकृति-प्रदत्त प्रदूषक पदार्थों का प्राकृतिक तरीकों से ही उपचार हो जाता है, जैसा कि पदार्थों के चक्रों में आप पढ़ चुके हैं। किन्तु मनुष्य की कृषि या औद्योगिक गतिविधियों से उत्पन्न प्रदूषक पदार्थों के लिये न तो प्रकृति में कोई व्यवस्था है एवं न ही मनुष्य उसके उपचार हेतु पर्याप्त प्रयत्न कर पा रहा है। फलस्वरूप, बीसवीं सदी के इन अन्तिम वर्षों में मनुष्य को एक प्रदूषण युक्त वातावरण में रहना पड़ रहा है। यद्यपि हम वातावरण को शत-प्रतिशत प्रदूषणमुक्त तो नहीं कर सकते, किन्तु ऐसे प्रयास तो कर ही सकते हैं कि वे कम-से-कम हानिकारक हों। ऐसा करने के लिये प्रत्येक मनुष्य को पर्यावरण-संरक्षण को उतनी ही प्राथमिकता देनी होगी जितनी कि अन्य भौतिक आवश्यकताओं को वह देता है। प्रदूषक पदार्थ तीन प्रकार के हो सकते हैं- (अ) जैव निम्नीकरणीय या बायोडिग्रेडेबल प्रदूषक- (Biodegradable Pollutants) जिन प्रदूषक पदार्थ का प्राकृतिक क्रियाओं से अपघटन (decompose) होकर निम्नीकरण (डिग्रेडेशन) होता है, उन्हें बायोडिग्रेडेबल प्रदूषक कहते हैं। उदाहरणार्थ, घरेलू क्रियाओं से निकले जल-मल (domestic sewage) का अपघटन सूक्ष्मजीव करते हैं। इसी प्रकार मेटाबोलिक क्रियाओं के उपोत्पाद (by products) जैसे CO नाइट्रेट्स एवं तापीय प्रदूषण (thermal pollution) से निकली ऊष्मा आदि का उपचार प्रकृति में ही इस प्रकार से हो जाता है कि उनका प्रभाव प्रदूषक नहीं रह जाता। (ब) अनिम्नीकरणीय या नॉन-डिग्रेडेबल प्रदूषक (Non-biodegradable Pollutants) ये प्रदूषक पदार्थ होते हैं जिनका प्रकृति में प्राकृतिक विधि से निम्नीकरण नहीं हो सकता। प्लास्टिक पदार्थ, अनेक रसायन, लम्बी शृंखला वाले डिटर्जेन्ट (long chain detergents) काँच, अल्युमिनियम एवं मनुष्य द्वारा निर्मित असंख्य कृत्रिम पदार्थ (synthetic material) इसी श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं। इनका हल दो प्रकार से हो सकता है- एक तो इनका पुनः उपयोग अर्थात पुनर्चक्रण (recycling) करने की तकनीकों का विकास तथा दूसरे इनकी अपेक्षा वैकल्पिक डिग्रेडेबल पदार्थों का उपयोग। इस श्रेणी में भारी धातुएँ (पारा, सीसा, कैडमियम आदि) धूमकारी गैसें (smog gases), रेडियोधर्मी पदार्थ, कीटनाशक (insecticides) एवं ऐसे अनेक कृषि एवं औद्योगिक बहिःस्राव (effluents) आते हैं जिनकी विषाक्तता के बारे में अभी जानकारी नहीं है। इस श्रेणी के अनेक प्रदूषकों का एक विशेष गुण होता है कि ये आहार-शृंखला में प्रवेश करने के पश्चात हर स्तर पर सांद्रित (concentrate) होते जाते हैं। इस श्रेणी के प्रदूषक वास्तव में मानव एवं अन्य जीवधारियों के स्वास्थ्य के लिये अत्यधिक हानिकारक हैं। उपरोक्त प्रकार के प्रदूषक तथा ध्वनि जैसे अन्य कारणों से उत्पन्न प्रदूषण मुख्य रूप से निम्न प्रकार के होते हैं- (1) जल-प्रदूषण (2) वायु- प्रदूषण (3) महानगरीय प्रदूषण (4) रेडियोधर्मी-प्रदूषण (5) शोर-प्रदूषण इनमें से पाठ्यक्रमानुसार जल, वायु एवं मृदा-प्रदूषण का अध्ययन करोगे। ‘जल के बिना जीवन सम्भव नहीं’ – यह वाक्य ही जल के महत्त्व को पर्याप्त रूप से दर्शाता है। दुर्भाग्य से आज हम शुद्ध पेयजल को तरस रहे हैं। जल-प्रदूषण अशुद्धियों की जानकारी दी जा रही हैं। जल में उपस्थिति अपद्रव्य पदार्थों को निम्न श्रेणियों में विभक्त किया जाता है- इन पदार्थों के कण 1μ से अधिक व्यास के होते हैं। इन्हें छानकर अलग किया जा सकता है। रेती, मिट्टी, खनिज-लवण, शैवाल, फफूँद एवं विविध अजैव पदार्थ इस श्रेणी के अपद्रव्य पदार्थ हैं। इनकी उपस्थिति से जल मटमैला दिखता है। इन अपद्रव्य पदार्थों के कण कोलॉइड रूप में होते हैं। ये कण अतिसूक्ष्म होते हैं। (एक मिली माइक्रोन से एक माइक्रोन के बीच) अतः इन्हें छानकर अलग करने सम्भव नहीं होता। जल का प्राकृतिक रंग इन्हीं के कारण दिखता है। सिलिका एवं विभिन्न धातुओं के ऑक्साइड (जैसे- Al आदि) बैक्टीरिया आदि इसी श्रेणी के अपद्रव्य हैं। प्रारकृतिक जल जब विभिन्न स्थानों से बहता है तो उसमें अनेक ठोस, द्रव एवं गैस घुल जाती हैं। जल में घुलित ठोस पदार्थों की सान्द्रता को पीपीएम (ppm-part per million) इकाई में मापा जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पेयजल हेतु कुछ मानक निर्धारित किये हैं। यदि किसी जल में उक्त पदार्थों की मानक मात्रा से अधिक है तब उसे प्रदूषित जल कहेंगे। जल प्रदूषण के दो प्रमुख स्रोत होते हैं- (अ) प्राकृतिक स्रोत- प्राकृतिक रूप से भी जल का प्रदूषण होता रहता है। इसका कारण भू-क्षरण, खनिज-पदार्थ पौधों की पत्तियाँ, ह्यूमस तथा जन्तुओं के मलमूत्र का जल के प्राकृतिक स्रोतों में मिलना है। यह प्रदूषण बहुत धीमी गति से होता है किन्तु अवर्षा की स्थिति में जलाशयों में कम पानी रहने पर इनके दुष्प्रभाव गम्भीर हो सकते हैं। जल में कुछ विषैली धातुएँ भी घुली होती हैं- आर्सेनिक, सीसा, कैडमियम, पारा, निकल, बेरीलियम, कोबाल्ट, मॉलीब्डेनम, टिन, वैनेडियम ऐसी ही धातुएँ हैं। (ब) मानवीय स्रोत- मानव द्वारा जल-प्रदूषण निम्न कारणों से होता है- घरेलू कार्यों में उपयोग किया जल अन्य अपशिष्ट पदार्थों के रूप में बहिःस्राव (effluent) के रूप में बहा दिया जाता है। इस बहिःस्राव में सड़े फल, तरकारियाँ, चूल्हे की राख, कूड़ा-करकट, डिटर्जेन्ट पदार्थ आदि होते हैं। इनमें से डिटर्जेन्ट पदार्थ जिन रसायनों से बने होते हैं उनका जल में उपस्थित बैक्टीरिया भी निम्नीकरण (degradation) नहीं कर पाते। अतः इन पदार्थों का प्रभाव स्थायी होता है। जल-प्रदूषण का यह सबसे बड़ा स्रोत माना जाता है। इसमें मानव के मलमूत्र का समावेश होता है। अधिकांश स्थानों पर ये पदार्थ बिना उपचारित किये ही नदी, नालों या तालाबों में बहा दिये जाते हैं। वाहित मल में कार्बनिक एवं अकार्बनिक दोनों प्रकार के पदार्थ होते हैं। कार्बनिक पदार्थों की अधिकता से विभिन्न सूक्ष्म जीव, जैसे-बैक्टीरिया, वायरस, अनेक एक कोशिकीय पौधे एवं जन्तु, फफूँद आदि तीव्रता से वृद्धि करते हैं, एवं वाहित मल के साथ पेयजल स्रोतों में मिल जाते हैं। उल्लेखनीय है कि मनुष्य की आँत में रहने वाले ई. मानवीय प्रदूषण जैसे सामाजिक प्रदूषण, राजनीतिक प्रदूषण, जातीय प्रदूषण, धार्मिक प्रदूषण, आर्थिक प्रदूषण आदि। सामान्य अर्थों में पर्यावरण प्रदूषण का प्रयोग भौतिक प्रदूषण के संदर्भ में किया जाता है। आधुनिक परमाणु, औद्योगिक, श्वेत एवं हरित-क्रान्ति के युग की अनेक उपलब्धियों के साथ-साथ आज के मानव को प्रदूषण जैसी विकराल समस्या का सामना करना पड़ रहा है। वायु जिसमें हम साँस लेते हैं, जल, जो जीवन का भौतिक आधार है एवं भोजन जो ऊर्जा का स्रोत है- ये सभी प्रदूषित हो गए हैं। प्रसिद्ध पर्यावरण वैज्ञानिक इ.पी. कोलाई बैक्टीरिया की जल में उपस्थिति को जल-प्रदूषण का सूचक माना जाता है। उद्योगों के जो संयंत्र लगाए जाते हैं उनमें से अधिकांश में जल का प्रचुर मात्रा में उपयोग होता है। प्रत्येक उद्योग में उत्पादन प्रक्रिया के उपरान्त अनेक अनुपयोगी पदार्थ शेष बचते हैं। ये पदार्थ जल के साथ मिलकर बहिःस्राव के रूप में निष्कासित कर समीप की नदी या अन्य जलस्रोत में बहा दिये जाते हैं। औद्योगिक बहिःस्राव में अनेक धात्विक तत्व तथा अनेक प्रकार के अम्ल, क्षार, लवण, तेल, वसा आदि विषैले पदार्थ होते हैं जो जल-प्रदूषण कर देते हैं। लुगदी तथा कागज-उद्योग, शकर-उद्योग, कपड़ा उद्योग, चमड़ा उद्योग, मद्य-निर्माण, औषधि-निर्माण, रसायन-उद्योग एवं खाद्य-संसाधन उद्योगों से विभिन्न प्रकार के अपशिष्ट पदार्थ बहिःस्राव (effluent) के रूप में नदी नालों में बहाए जाते हैं। इन प्रदूषक पदार्थों से जल दुर्गन्धयुक्त एवं गन्दे स्वाद वाला हो जाता है। इनमें से कुछ अपशिष्ट पदार्थ ऐसे भी होते हैं जो पेयजल शोधन में उपयोग में ली जाने वाली क्लोरीन के साथ मिलकर ऐसे यौगिक बना देते हैं जिनका स्वाद एवं गन्ध मूल पदार्थ से भी अधिक खराब होता है। कुछ विषैली धातुएँ जैसे आर्सेनिक खदानों से वर्षा के जल के साथ मिलकर जलस्रोत में मिल जाती हैं। औद्योगिक बहिस्राव में सर्वाधिक खतरा पारे से होता है। पारे के घातक प्रभाव का सबसे बड़ा उदाहरण जापान की मिनीमेटा (minimata) खाड़ी के लोगों को 1950 में हुई एक भयानक बीमारी है। रोग का नाम भी मिनिमेटा रखा गया। खोज करने पर विदित हुआ है कि ये लोग जिस स्थान की मछलियों को खाते थे उनके शरीर में पारे की उच्च सान्द्रता पाई गई। इस खाड़ी में एक प्लास्टिक कारखाने से पारे का बहिःस्राव होता था। आजकल अपनाई जाने वाली कृषि प्रणालियों को दोषपूर्ण तरीके से उपयोग में लेने से मृदा-क्षरण होता है, फलस्वरूप मिट्टी पेयजल में लाकर उसे गन्दा करती है। इसके अलावा अत्यधिक रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशकों के प्रयोग से कृषि बहिःस्राव में अनेक ऐसे पदार्थ होते हैं जो पेयजल में मिलने से उसे प्रदूषित करने में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में सहायक होते हैं। अधिकांश उर्वरकों में नाइट्रोजन एवं फॉस्फोरस होता है। अधिक मात्रा में जलाशयों में पहुँचने पर ये शैवाल उत्पन्न करने में सहायक होते हैं। अत्यधिक शैवाल जमा होने से जल पीने योग्य नहीं रह पाता तथा उनके अपघटक बैक्टीरिया की संख्या भी अत्यधिक हो जाती है। इनके द्वारा की जाने वाली अपघटन क्रिया से जल में ऑक्सीजन की मात्रा घटने लगती है एवं जल प्रदूषित हो जाता है। कीटनाशकों एवं खरपतवारनाशकों के रूप में उपयोग में लिये जाने वाले रसायन पारा, क्लोरीन, फ्लोरिन, फॉस्फोरस जैसे विषैले पदार्थों से बने होते हैं। ये पदार्थ निम्न प्रकार से कार्बनिक एवं अकार्बनिक रसायनों से बनते हैं- (अ) अकार्बनिक- (1) आर्सेनिक यौगिक (2) पारे के यौगिक एवं (3) गंधक के यौगिक (ब) कार्बनिक- (1) पारा या क्लोरीन युक्त हाइड्रोकार्बन एवं (2) तांबा, फॉस्फोरस के कार्बो-धात्विक यौगिक। कुछ कीटनाशक पदार्थ जो जल में मिल जाते हैं, जलीय जीवधारियों के माध्यम से विभिन्न पोषी-स्तरों में पहुँचते हैं। प्रत्येक स्तर पर जैविक क्रियाओं से इनकी सान्द्रता में वृद्धि होती जाती है। इस क्रिया को जैविक-आवर्द्ध (biomagnification) कहते हैं। यह प्रदूषण नदी-झीलों की अपेक्षा समुद्रीजल में अधिक होता है। समुद्री जल का तैलीय प्रदूषण निम्न कारणों से होता है- (1) जलायनों द्वारा अपशिष्ट तेक के विसर्जन से। (2) तेल वाहक जलयानों की दुर्घटना से। (3) तेल वाहक जलयानों में तेल चढ़ाते या उतारते समय। (4) समुद्र किनारे खोदे गए तेल कुओं से लीकेज के कारण। (अ) मनुष्य पर प्रभाव (ब) जलीय वनस्पति पर प्रभाव (स) जलीय जन्तुओं पर प्रभाव (द) विविध प्रभाव (1) पेयजल से- प्रदूषित जल के पीने से मनुष्य के स्वास्थ्य पर अनेक हानिकारक प्रभाव होते हैं। प्रदूषित जल में अनेक सूक्ष्म जीव होते हैं जो विभिन्न प्रकार के रोगों के या तो कारण बनते हैं या रोगजनक का संचरण करते हैं। प्रदूषित जल से होने वाले रोग निम्नानुसार हैं- बैक्टीरिया जनित- हैजा, टाइफॉइड, डायरिया, डिसेन्ट्री आदि। वाइरस जन्य- पीलिया, पोलियो आदि। प्रोटोजोआ जन्य- पेट तथा आँत सम्बन्धी अनेक विकार जैसे- अमीबिक डिसेन्ट्री, जिएर्डिसिस आदि। आँत के कुछ परजीवी जैसे एस्केरिस का संक्रमण पेयजल के द्वारा ही होता है। नारू के कृमि भी पेयजल में उपस्थित साइक्लोप्स के कारण मनुष्य में पहुँचते हैं। (2) जल-सम्पर्क से- प्रदूषित जल के शरीर-सम्पर्क होने पर अनेक रोग-कारक परजीवी मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। या फिर रोगी मनुष्य के शरीर से निकलकर जल में मिल जाते हैं। नारू इसका एक उदाहरण है। (3) जलीय रसायनों से- जल में उपस्थित अनेक रासायनिक पदार्थों की आवश्यकता से अधिक मात्रा में से स्वास्थ्य पर अनेक प्रभाव होते हैं। प्रदूषित जल से जलीय वनस्पति पर निम्न प्रभाव होते हैं- (i) बहिःस्रावों में उपस्थित अधिक नाइट्रोजन एवं फॉस्फोरस से शैवाल में अतिशय वृद्धि होती है। सतह पर अधिक मोटी काई के कारण सूर्य-प्रकाश अधिक गहराई तक नहीं पहुँच पाता। (ii) प्रदूषित जल में अन्य सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ती है। ये सूक्ष्म जीव समूह में एकत्रित हो जाते हैं, जिन्हें मल-कवक (sewage fungus) के रूप में जाना जाता है। (iii) प्रदूषक तत्व धीरे-धीरे तलहटी पर जमा होते जाते हैं, फलस्वरूप जड़ वाले जलीय पौधे समाप्त होते जाते हैं एवं जलीय खरपतवार (जल हायसिंथ, जलीय फर्न, जलीय लेट्यूस आदि में वृद्धि होती है। (iv) तापीय प्रदूषण से जल का तापमान बढ़ता है जिससे प्लवक एवं शैवालों की वृद्धि होने से जलीय ऑक्सीजन में कमी आती है। जलीय वनस्पति पर ही जलीय जन्तुओं का जीवन आधारित होता है। अतः जल-प्रदूषण से जलीय वनस्पति के साथ ही जलीय जन्तुओं पर भी प्रभाव होते हैं। संक्षेप में निम्न प्रभाव होते हैं- (i) ऑक्सीजन की कमी से अनेक जन्तु, विशेषकर मछलियाँ मरने लगती हैं। 1940 में जल के एक लीटर नमूने में सामान्यतया 2.5 घन सेमी. The critical threshold of its ability to naturally eliminate substances is compromised and the balance of the ecosystem is broken. The identification of these different pollutants and their effects on ecosystems is complex.

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